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सफलता का सूत्र, लक्ष्य निर्धारित कर मेहनत करें- रविंद्र कुमार




सिक्किम कैड़र 2011 बैंच के आइएएस रविन्द्र कुमार देश में सफलता की मिशाल पेश करने वाले एकलौते ऐसे आइएएस हैं जो देश की सबसे उंची चोटी माउंट एवरेस्ट तक की चढ़ाई पूरी कर चुके हैं. रविन्द्र के लिए ये लक्ष्य आसान नहीं था लेकिन लक्ष्य की इस दिशा में किये गये मजबूत संकल्प, विश्वास और कठिन परिश्रम उनके लिए खुद सफलता की सीढ़ियां बनी. समय के अभाव के बीच अपनी जिम्मेदारी निर्वहन करते हुए जिस प्रकार से एवरेस्ट पर चढ़ाई करने की ट्रेनिंग, निरंतर अभ्यास के दौरान समय को मैनेज किया इससे उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व साफ दिखाई पड़ता है, शिपिंग की जॉब छोड़कर पब्लिक सेवा के लिए आये रविंद्र की कहानी दिलचस्प है.

प्रस्तुत है संवाददाता अवनीश त्रिपाठी से बातचीत के मुख्य अंश....

आप शिपिंग में जॉब छोड़कर सिविल में क्यों आये.

मुझे पब्लिक के बीच रहकर काम करने का ज्यादा शौक था. शीप में काम करने के दौरान ऐसा लगता था कि ये काम मैं किसी कामर्शियल कम्पनी के लिए काम कर रहा हूं न कि सोशल वेलफेयर के लिए, मेरी इच्छा पूरी नहीं हो रही थी, यही मुझे पब्लिक सर्विस में खीच कर लायी. जबकि पैसा मुझे यहां से दस गुना ज्यादा मुझे शिपिंग में मिलता था लेकिन घर से मिले संस्कार के कारण शुरू से ही लोगों की सेवा के प्रति आदर भाव था इसी को पूरा करने के लिए पब्लिक सर्विस में आया.

आइएएस बनने के बाद एवरेस्ट पर चढ़ाई करने की राह को कैसे चुना.

आपके अंदर किसी काम को करने का पैशन हो तो चैलेंज काफी छोटा दिखाई पड़ने लगता है. जब मुझे सिक्किम कैड़ेट मिला तो सिक्किम के बारें में इंफारमेंशन सिलेक्ट करते समय मेरा ध्यान 18 सितम्बर 2011 को हुए बहुत बड़े अर्थ क्वेट पर गया, जिसके कारण फुली एरिया एडमिनिस्ट्रेशन से डिस्कनेक्ट हो गया था. तब प्रशासन ने मदद के लिए माउंटनियर को हायर किया गया था. यह बात देखकर मेरे दिमाग में आया कि यदि इफेक्टिव एडमिनिस्ट्रेटर बनना है तो इस तरह कि इमरजेंसी में लोगों तक पहुंचना होगा. तब मुझे लगा कि मांउटेरियन स्किल की जरूरत है मैं विशेष तौर पर इफेक्टिव एरिया में काम करने की सोच से अपने अंदर विश्वास जगाया और पूरी तैयारी करने में जुट गया. लोगों ने मुझसे कहां कि कंचनजंघा जाइये, लेकिन मुझे लगा कि कंजनजंघा क्यों एक ही बार में एवरेस्ट न जायें. इस तरह मैंने एवरेस्ट पर चढ़ाई करने का निश्चय किया.

एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान बिना अनुभव के आपको किन कठिनाईयों का सामना करना पड़ा. आपने इस उंचाई को कैसे छुआ.

मेरा मानना है कि अनुभव नहीं होने से हिम्मत नहीं हारना चाहिए, जब हम ड्रीम निर्धारित करके उसको पाने के लिए मेहनत करते हैं तो ड्रीम रियलाइज होता है, जिससे आपका विश्वास मजबूत होता है औऱ लक्ष्य नजदीक दिखाई पड़ने लगता है. मुझे अनुभव न होने के बावजूद यह विश्वास था कि सिस्टम से आगे बढूंगा तो सफलता जरूर मिलेगी. ट्रेनिंग के लिए छुट्टी लेना मुश्किल लग रहा था लेकिन मेरे अधिकारियों ने मेरा सपोर्ट किया और दार्जिलिंग में एमएचआइ एक माह की बेसिक ट्रेनिंग ली जिसमें सर्बाइबल 40,000 फीट था में A ग्रेड मिला. इसके साथ मेरा पर्सनल प्रैक्टिस था, जिसमें डेली सुबह 5 से 9 जॉगिंग, स्ट्रैचिंग करता था. इसके बाद मुझे फाइनेन्स की दिक्कत आयी, हांलाकि मेरे उपर कोड ऑफ कंडक्ट लागू होता है तो उस समय सिक्किम गवर्नमेंट की एक्सपीडिशन एवरेस्ट के लिए जा रहा था जिसमें काफी मशक्कत करने के बाद जगह मिली, लेकिन लास्ट मोमेंट पर किसी पॉलिटिकल कंट्रोवर्सी के कारण रद्द हो गया फिर वो मेरे लिए बहुत निराशा का कंडीशन था लेकिन मैंने सोचा कि जब प्रैक्टिस किया हूं तो जरूर जाऊगां फिर मैंने प्राइवेट फंड से जाने का निश्चय किया. नेपाल बेस एजेंसी से सम्पर्क किया जिसके लिए एक सप्ताह में 20 लाख फंड इकठ्ठा करना था जो काफी मुश्किल लग रहा था लेकिन दोस्तों की मदद औऱ बैंक लोन से राह आसान हो गया. 80 प्रतिशत कठिनाईयां मेंरे लिए गैंगटाक तक था छुट्टी लेकर ट्रेनिंग करने, फाइनेंशियल अरेंज करने इसके बाद कोई दिक्कत नहीं हुआ.

आप एवरेस्ट की तैयारी करने वालों के लिए क्या अनुभव साझा करेगें.

पहले से प्लानिंग करके प्रैक्टिस करना चाहिए, ट्रेनिंग सेशन में लेवल क्या है, आपको फाइनल स्टेज जैसी चुनौती को अपने निरंतर अभ्यास में तब्दील करना होगा क्योंकि जब आप फाइनल में क्लाइम करने जाते है तो कैम्फोड से जब शाम में स्टार्ट करते है औऱ सुबह तक चोटी में पहुंचते हैं वो सबसे टप स्टेज माना जाता है. तो मैंने पहले एक-एक दिन में 50-60 किलोमीटर तक कवर किया औऱ आगे और भी बढ़ाता रहा. इससे बुसअप मिलता है. लोगों को ये संदेश देना चाहूंगा कि आप ट्रेनिंग के दौरान इतना प्रैक्टिस कर ले कि जब आपके सामने कठिनाइयां आये तो ज्यादा दिक्कत का सामना ना करना पड़े लेकिन इसके लिए हार्डवर्क औऱ डिटरमिनेशन दोनों बहुत जरूरी है. कुछ लोग अपने आप को बहुत कमजोर समझते हैं कि ये हमसे नहीं होगा लेकिन आपका डिटरमिनेशन इतना तेज होना चाहिए कि आप चाह ले और ये सोचिये कि अब उसे पा जाउंगा.

अपने शुरुआती शिक्षा दीक्षा के बारे में बताएं.

10 वीं जवाहर नवोदय विद्यालय बेगुसराय, 10+2, डीएवी रांची से औऱ सेम ईयर मैंने IIT JEE में सेलेक्शन हुआ, लेकिन मुझे सिविल में जाना था तो मैंने टीएस चाणक्या से 3 साल ग्रेजुएशन एयरोनॉटिकल साइंस किया, जिसमें मुझे वेस्ट ऑलराउंडर कैडेट ऑफ द बैच का अवॉर्ड भी मिला.

आप यूपीएससी की परीक्षा में सफलता अर्जित की. निश्चित तौर पर यह आपके लिए बड़ी चुनौती रही होगी. आपने इसके लिए कैसे पार पाया.

निश्चिततौर पर यूपीएससी के लिए जबरदस्त परिश्रम करना पड़ता है. मैं ग्रेजुएशन एयरोनॉटिकल करने के बाद पांच साल शिपिंग में जॉब किया, इस समय तक तो पढ़ाई करने की आदत तो छूट चुकी थी, लेकिन शिपिंग मे जॉब करने से देश-दुनिया की काफी जानकारियां हासिल कर चुका था. इसलिए विषय में मैने भूगोल का चुनाव किया इसके साथ लोक प्रशासन का चुनाव किया, जिसका आगे भी उपयोग हों. आइएएस बनने के लिए परिश्रम के साथ विश्वास बनाये रखना बहुत जरूरी होता है.

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